Jul 2, 2018

काम पूरा नहीं हुआ, बरसात शुरू, रेल ब्रिज रहा जैसा का तैसा



दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, बिलासपुर मंडल के अंतर्गत चांपा के पास हसदेव नदी पर बना रेलवे पुल (ब्रिज नं. 46) रेल संरक्षा की दृष्टि से मात्र 14-15 वर्षों के भीतर ही अत्यंत खतरनाक घोषित किया जा चुका है. अधिकारिक जानकारी के अनुसार इस पुल के चार पाये (पिलर) खराब हो गए हैं, जिनकी भीतरी स्थिति कमजोर हो चुकी है. इस पुल का निर्माण वर्ष 2004 में तत्कालीन डिप्टी सीई/सी, बिलासपुर के सुपरविजन में किया गया था. उल्लेखनीय है कि इस तरह के किसी भी रेलवे पुल का निर्माण कम से कम सौ-सवा सौ साल की अवधि को ध्यान में रखकर किया जाता है. अब ऐसे में यदि मात्र 14-15 वर्षों के अंदर ही यह पुल बेकार हो गया है, तो समझा जा सकता है कि इसके निर्माण में किस स्तर की धांधली हुई होगी. 

प्राप्त जानकारी के अनुसार उक्त ब्रिज के खासतौर पर पी-3, पी-3ए, पी-2ए एवं पी-4 पिलर्स को ज्यादा खतरनाक बताया गया है. इनकी शिनाख्त फरवरी-मार्च में ही हो गई थी. इसके साथ ही इस ब्रिज की डाउन लाइन पर 20 किमी. की गति सीमा भी लगा दी गई थी, जिसका सीधा मतलब यह होता है कि इसके ऊपर से सिर्फ खाली वैगन अथवा खाली मालगाड़ी ही निकाली जा सकती है, कोई यात्री या सवारी गाड़ियां इससे नहीं निकाली जा सकती हैं. इसके रिहैबिलिटेशन का टेंडर 4 अप्रैल को जारी किया गया था और काम पूरा होने की समय-सीमा 45 दिन यानि 20 मई के आसपास निर्धारित की गई थी, जबकि तब तक व्यवस्थित रूप से यह काम शुरू भी नहीं हो पाया था. 

इससे पहले यह टेंडर जारी करने में भारी धांधली की गई. विश्वसनीय सूत्रों से ‘रेलवे समाचार’ को प्राप्त जानकारी के अनुसार बिलासपुर मंडल द्वारा इस आपातकालीन रिहैबिलिटेशन के लिए सिंगल टेंडर मुंबई की फर्म को देने का प्रस्ताव तैयार करके पीसीई के माध्यम से मुख्यालय में जीएम की संस्तुति के लिए भेजा गया था. बताते हैं कि उस समय पीसीई का लुकआफ्टर चार्ज भी सीएओ/सी ही देख रहे थे. सूत्रों का कहना है कि जीएम की तरफ से इस टेंडर को दो भागों में बांटने का सुझाव देकर फाइल वापस लौटा दी गई. सूत्रों का कहना है कि जीएम ने बिलासपुर की एक स्थानीय फर्म को बुलाकर यह काम करने को कहा. सूत्रों का कहना है कि हालांकि उक्त फर्म ने यह कहकर उक्त काम लेने से मना करने का प्रयास किया कि उसे इस तरह के काम का कोई अनुभव नहीं है. 

तथापि, सूत्रों का कहना है कि जीएम ने इस टेंडर में नदी की सतह में बोल्डर डालने का नया काम निकालकर स्थानीय फर्म को यह काम करने को कहा. जबकि सूत्रों का कहना है कि ओरिजनल वर्क में सिर्फ पिलर्स का ही रिहैबिलिटेशन किया जाना था, बोल्डर डालने का कोई प्रस्ताव नहीं था और पूरा काम मुंबई की फर्म को ही दिया गया था. इस तरह टेंडर को दो भागों में बांटकर बड़ा भाग (6.59 करोड़) स्थानीय फर्म को और छोटा भाग (3.67 करोड़) मुंबई की फर्म को दिया गया. इस तमाम प्रक्रिया में करीब डेढ़ से दो महीने का कीमती समय बरबाद हो गया, जबकि इतने समय में ब्रिज का रिहैबिलिटेशन वर्क पूरा किया जा सकता था. 

यही नहीं, इस टेंडर में जीएम द्वारा की गई जोड़-तोड़ के बारे में जब स्थानीय मीडिया में कुछ सुगबुगाहट शुरू हुई, तो जीएम ने चीफ ब्रिज इंजीनियर से 11 मई को कार्य की संतोषजनक प्रगति का एक फर्जी सर्टिफिकेट जारी करवा दिया. इस दरम्यान इस आपातकालीन कार्य में बरती जा रही लापरवाही और जीएम की स्वार्थ लोलुपता के बारे में जब कुछ ट्वीट किए गए, तो इससे घबराकर सर्वप्रथम तो जीएम अचानक एक दिन कार्य-स्थल पर निरीक्षण के बहाने पहुंच गए. इसके तुरंत बाद ब्रिज पर लगी गति सीमा को बढ़ाकर 45 किमी. करवा दिया. जबकि कार्य-स्थल के चित्र देखकर बखूबी समझा जा सकता है कि उक्त समय में कार्य इतना नहीं हुआ था, कि गति सीमा बढ़ाई जा सके. 

जानकारों का कहना है कि इस रिहैबिलिटेशन कार्य में भारी गड़बड़ी की गई है. हालांकि ‘रेलवे समाचार’ ने दोनों फर्मों से उनका पक्ष जानने की पूरी कोशिश की, मगर दोनों ही फर्मों के मुख्य कर्ताधर्ताओं ने फोन पर खुद आकर जवाब देने की जरूरत नहीं समझी. उनके कार्यालयीन कर्मचारी मोबाइल नंबर लेकर बार-बार यही कहते रहे कि वह कॉल करवाएंगे, तथापि उनकी तरफ से खबर लिखे जाने तक कोई कॉल नहीं आया. जबकि हमारे सूत्रों का कहना है कि पूरा काम एक ही फर्म द्वारा किया जा रहा है और इसमें दोनों के बीच अंदरूनी साठ-गांठ भी हुई है, क्योंकि एक के नाम से बनने वाले बिल पर दूसरे को तमाम सरकारी औपचारिकताएं पूरी नहीं करनी पड़ेंगी. 

कार्य-स्थल की वर्तमान स्थिति यह है कि खबर लिखे जाने के समय बिलासपुर सहित कार्य क्षेत्र में जोरदार बरसात चालू है और नदी में पानी का स्तर बढ़ रहा है. ऐसे में संबंधित पिलर्स का जमीन और पानी के अंदर का हिस्सा रिहैबिलिटेट हो पाना अब अत्यंत मुश्किल हो गया है. जानकारों का कहना है कि यदि कार्य आवंटन में देरी नहीं की गई होती, तो यह कार्य काफी पहले पूरा हो सकता था. उनका कहना है कि जीएम की मनमानी और खुले भ्रष्टाचार के कारण यहां कोई भी विभाग प्रमुख अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं है. उनका यह भी कहना है कि जीएम खुद किसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करते हैं, वह सभी कार्यों का नियोजन कुछ इस तरह करवाते हैं कि वह संबंधित अधिकारियों के ही अधिकार क्षेत्र में रहें. क्रमशः

Source - Rail Samachar 

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